वैसे भारत में हरित क्रांति की शुरुआत १९६६-६७ में हुई थी और भारत खाद्दान की दिशा में आत्मनिर्भर होने की और अग्रसर होने लगा. परन्तु दुःख की बात है की अभी तक हम इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हुए है. आज कोई अपने बच्चे को किसान नहीं बनाना चाहता और जो किसान है वो भी अपना खेती का पेशा छोड़ रहे है…ऐसे में यह एक चिंता का विषय है.
पर कहते हैं ना हर समस्या का एक समाधान होता ही है..बस तो हमे भी अब चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है.
जो काम हमारी सरकारें वर्षों से नहीं कर सकी वो काम इन्टरनेट के अविष्कार ने कर दिया. सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद खेती करना किसी ने अपनी इच्छा से नहीं अपनाया वहीँ आजकल इन्टरनेट पर तेजी से लोकप्रिय हो रहे फार्म विल्ली और आईबीबो फार्म ने कर दिखाया है. इनकी लोकप्रियता का आलम यह है की बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़ कर इस खेती के खेल में व्यस्त रहते है.
सरकार बच्चों के इस शौक से बहुत उत्साहित है कि आने वाली पीढ़ी अब खेती बाड़ी में रूचि लेने लगी है.
हमारे पत्रकार उल्लू के पठ्ठे को कुछ बच्चों ने जो कि कंप्यूटर पर खेती बाड़ी के दीवाने हैं, बताया कि उन्हें इसमें इतना मजा आता है कि वो बड़े होकर डॉक्टर या इंजीनियर बनने कि नहीं बल्कि किसान बनने कि इच्छा रखते हैं. वैसे बच्चों और बड़े जो भी इस खेती बाड़ी के खेल में व्यस्त रहते है उनका मुख्य उद्शेय सिर्फ अधिक से अधिक अंक जुटाने का होता है…बहरहाल जो भी हो…किसी न किसी रूप में हमारा झुकाव खेती कि और तो हुआ और क्या पता आगे चल कर यही कंप्यूटर कि खेती बाड़ी कंप्यूटर से बाहर आकर एक नयी हरित क्रांति बन जाये.